जानिए, उस शख्स के बारे में जिसके लिए कॉपी चेकर ने लिखा था परीक्षार्थी ज्यादा काबिल

राजेंद्र प्रसाद की प्रांरभिक पढ़ाई छपरा के जिला स्कूल में हुई थी. उन्होंने 18 साल की उम्र में कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा प्रथम स्थान से पास की. इसके बाद विश्वविद्यालय की ओर से उन्हें 30 रुपये की स्कॉलरशिप मिलती थी. साल 1915 में राजेंद्र बाबू ने कानून में मास्टर की डिग्री हासिल की. उनकी प्रतिभा ने गोपाल कृष्ण गोखले और बिहार–विभूति अनुग्रह नारायण सिन्हा जैसे विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया. राजेंद्र प्रसाद पढ़ाई में बहुत अच्छे थे. उन्हें एक अच्छा छात्र माना जाता था. उनकी एग्जाम शीट को देखकर एक एग्जामिनर ने कहा था कि ‘The Examinee is better than Examiner.

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उनका पदार्पण वकील के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत करते ही हो गया था. राजेंद्र बाबू महात्मा गांधी की निष्ठा, समर्पण एवं साहस से बहुत प्रभावित हुए और 1921 में उन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय के सीनेटर का पदत्याग कर दिया. गांधी जी ने जब विदेशी संस्थानों का बहिष्कार की अपील की थी तो उन्होंने अपने पुत्र मृत्युंजय प्रसाद, जो एक अत्यंत मेधावी छात्र थे. उन्हें कोलकाता विश्वविद्यालय से हटाकर बिहार विद्यापीठ में दाखिल करवाया था. राजेंद्र प्रसाद ने सर्चलाइट और देश जैसी पत्रिकाओं में देश के तत्कालिक मुद्दों को लेकर कई लेख लिखे थे. इतना ही नहीं इन्होंने इन अखबारों के लिए धन भी जुटाए थे. 1914 में बिहार में आई बाढ़ में उन्होंने काफी बढ़चढ़ कर सेवा कार्य किया था. बिहार में 1934 में आई भूकंप के समय राजेन्द्र बाबू कारावास में थे. जेल से दो वर्ष की सजा के पश्चात वे भूकंप पीड़ितों के लिए धन जुटाने में तन–मन से जुट गये और उन्होंने वायसराय के जुटाए धन से कहीं ज्यादा धन जमा किया.
साल 1934 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गये. नेताजी सुभाषचंद्र बोस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने पर कांग्रेस अध्यक्ष का पदभार उन्होंने 1939 में संभाला था. भारत के संविधान निर्माण में राजेंद्र प्रसाद का बहुत बड़ा योगदान रहा है. संविधान लागू हो जाने के बाद उन्होंने देश के पहले राष्ट्रपति का पदभार संभाला. राष्ट्रपति के तौर पर उन्होंने कभी भी अपने संवैधानिक अधिकारों में प्रधानमंत्री या कांग्रेस को दखलअंदाज का मौका नहीं दिया और हमेशा स्वतंत्र रूप से कार्य करते रहे. हिंदू अधिनियम पारित करते समय भी उन्होंने कड़ा रुख अपनाया था. 12 वर्षों तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने के पश्चात उन्होने 1962 में अपने अवकाश की घोषणा की. अवकाश ले लेने के बाद उन्हें भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया.
अवकाश ग्रहण करते ही उनकी पत्नी राजवंशी देवी का निधन हो गया. मृत्यु के एक महीने पहले अपने पति को संबोधित पत्र में राजवंशी देवी ने लिखा था कि मुझे लगता है मेरा अंत निकट है, कुछ करने की शक्ति का अंत, संपूर्ण अस्तित्व का अंत. डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपने जीवन का आखिरी महीना पटना सदाकत आश्रम में बिताया था. 28 फरवरी 1963 को उनकी जीवन लीला समाप्त हो गई.
डॉ. राजेंद्र प्रसाद भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं…. लेकिन उनके द्वारा किये गए कृत हम सभी हमेशा प्रेरणा देते रहेंगे. और हम सदा उनपर गर्व करेंगे…

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